Sunday, 12 May 2019

झुन्झुनू का इतिहास

झुन्झुनू का इतिहास

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झुन्झुनू
—  शहर  —
निर्देशांक: (निर्देशांक ढूँढें)
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देशFlag of India.svg भारत
राज्यराजस्थान
महापौर
संतोष अहलावत
जनसंख्या118,473 (2011 के अनुसार )
 झुन्झुनू राजस्थान राज्य में एक शहर और जिला है।
इतिहासकारों के अनुसार झुंझुनू को कब और किसने बसाया, इसका स्पष्ट विवरण नही मिलता है| उनके अनुसार पांचवी-छठी शताब्दी में गुर्जर काल में झुंझुनू बसाया गया था| आठवीं शताब्दी में चौहान शासकों के काल का अध्ययन करते हैं तो उसमे झुंझुनू के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है| डॉ. दशरथ शर्मा ने तेहरवी शताब्दी के कस्बों की जो सूची दी है उसमे झुंझुनू का भी नाम है| इसी प्रकार अनंत और वागड राज्यों के उल्लेख में भी झुंझुनू का अस्तित्व कायम था|
सुलतान फिरोज़ तुगलक (ई. सन १३३८-१३५१) के बाद कायमखानी वंशज आये| कहते हैं, कायम खान के बेटे मुहम्मद खान ने झुंझुनू में अपना राज्य कायम किया, इसके बाद लगातार यह क्षेत्र कयामखानियों के अधिपत्य में रहा| एक उल्लेख यह भी मिलता है की सन १४५१-१४८८ के बीच झुन्झा नमक जाट ने झुंझुनू को बसाया|

जुझारसिंह नेहरा

जुझारसिंह नेहरा (1664 – 1730) राजस्थान के बड़े मशहूर योद्धा हुए हैं, उन्हीं के नाम से झुंझुनू जैसा नगर प्रसिद्द है।

नेहरा जाटों का इतिहास

नेहरा भारत और पाकिस्तान में जाटों का एक गोत्र है। ये राजस्थानदिल्लीहरयाणापंजाबउत्तर प्रदेश और पाकिस्तान में पाए जाते हैं। नेहरा की उत्पत्ति वैवस्वत मनु के पुत्र नरिष्यंत (नरहरी) से मानी जाती है। पहले ये पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में नेहरा पर्वत पर निवास करते थे। वहां से चल कर राजस्थान के जांगलदेश भू-भाग में बसे और झुंझुनू में नेहरा पहाड़ पर आकर निवास करने लगे।
राजस्थान में नेहरा जाटों का तकरीबन २०० वर्ग मील भूमि पर किसी समय शासन रहा था। उनके ही नाम पर झुंझुनू के निकट पर्वत आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है। दूसरा पहाड़ जो मौरा (मौड़ा) है, मौर्य लोगों के नाम से मशहूर है। नेहरा लोगों में सरदार झुन्झा अथवा जुझारसिंह नेहरा बड़े मशहूर योद्धा हुए हैं, उन्हीं के नाम से झुंझुनूजैसा नगर प्रसिद्द है।
पंद्रहवीं सदी में नेहरा लोगों का नरहड़ में शासन था। वहां पर उनका एक किला भी था। उससे १६ मील पश्चिम में नेहरा पहाड़ के नीचे नाहरपुर में उनके दूसरे दल का राज्य था। सोलहवीं सदी के अंतिम भाग में और सत्रहवीं सदी के प्रारंभ में नेहरा लोगों का मुसलमान शासकों से युद्ध हुआ। अंत में नेहरा लोगों ने मुसलमानों से संधि करली.
नेहरा लोगों के प्रसिद्द सरदार जुझारसिंह नेहरा का जन्म संवत १७२१ विक्रमी श्रावण महीने में हुआ था। उनके पिता नवाब के यहाँ फौज के सरदार यानि फौजदार थे। युवा होने पर सरदार जुझार सिंह नवाब की सेना में जनरल बन गए। उनके दिल में यह बात पैदा हो गयी कि भारत में जाट साम्राज्य स्थापित हो। जुझार सिंह ने पंजाबभरतपुरब्रज के जाट राजाओं और गोकुला के बलिदान की चर्चा सुन रखी थी। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि नवाबशाही के खिलाफ जाट लोग मिल कर बगावत करें।
उन्हीं दिनों सरदार जुझार सिंह की मुलाकात एक राजपूत से हुई। वह किसी रिश्ते के जरिये नवाब के यहाँ नौकर हो गया। उसका नाम शार्दुल सिंह था। दोनों का सौदा तय हो गया। शार्दुल सिंह ने वचन दिया कि इधर से नवाबशाही के नष्ट करने पर हम तुम्हें (सरदार जुझार सिंह को) अपना सरदार मान लेंगे. अवसर पाकर सरदार जुझार सिंह ने झुंझुनू और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया और बाकि मुसलमानों को भगा दिया।
कुंवर पन्ने सिंह द्वारा लिखित 'रणकेसरी जुझार सिंह' नमक पुस्तक में अंकित है कि सरदार जुझार सिंह को दरबार करके सरदार बनाया गया। सरदार जुझार सिंह का तिलक करने के बाद एकांत में पाकर विश्वास घात कर शेखावतों ने सरदार जुझार सिंह को धोखे से मार डाला। इस घृणित कृत्य का समाचार ज्यों ही नगर में फैला हाहाकार मच गया। जाट सेनाएं बिगड़ गयी। फिर भी कुछ लोग विपक्षियों द्वारा मिला लिए गए। कहा जाता है कि उस समय चारण ने शार्दुल सिंह के पास आकर कहा था -
सादे लीन्हो झूंझणूं, लीनो अमर पटै
बेटे पोते पड़ौते, पीढी सात लटै
अर्थात - सादुल्लेखान से इस राज्य को झून्झा (जुझार सिंह) ने लिया था, वह तो अमर हो गया। अब इसमें तेरे वंशज सात पीढी तक राज करेंगे।
जुझार अपनी जाती के लिए शहीद हो गया। वह संसार में नहीं रहे, किन्तु उनकी कीर्ति आज तक गाई जाती है। झुंझुनू शहर का नाम जुझार सिंह के नाम पर झुन्झुनू पड़ा है।

शेखावतों का जाटों के साथ समझोता

शेखावतों ने जाट-क्षत्रियों के विद्रोह को दबाने के लिए तथा उन्हें प्रसन्न रखने के लिए निम्नलिखित आज्ञायेँ जारी की गयी -
  1. लगान की रकम उस गाँव के जाट मुखिया की राय से ली जाया करेगी।
  2. जमीन की पैमयश गाँव के लम्बरदार किया करेंगे।
  3. गोचर भूमि के ऊपर कोई कर नहीं होगा।
  4. जितनी भूमि पर चारे के लिए गुवार बोई जावेगी उस पर कोई कर नहीं होगा।
  5. गाँव में चोरी की हुई खोज का खर्चा तथा राज के अधिकारियों के गाँव में आने पर उन पर किया गया खर्च गाँव के लगान में से काट दिया जावेगा. जो नजर राज के ठाकुरों को दी जायेगी वह लगान में वाजिब होगी।
  6. जो जमीन गाँव के बच्चों को पढ़ाने वाले ब्राहमणों को दो जायेगी उसका कोई लगान नहीं होगा। जमीन दान करने का हक़ गाँव के मुखिया को होगा।
  7. किसी कारण से कोई लड़की अपने मायके (पीहर) में रहेगी तो उस जमीन पर कोई लगान न होगा, जिसे लड़की अपने लिए जोतेगी.
  8. गाँव का मुखिया किसी काम से बुलाया जायेगा तो उसका खर्च राज देगा।
  9. गाँव के मुखिया को जोतने के लिए जमीन मुफ्त दी जायेगी. सारे गाँव का जो लगान होगा उसका दसवां भाग दिया जायेगा.
  10. मुखिया वही माना जायेगा जिसे गाँव के लोग चाहेंगे. यदि सरदार गाँव में पधारेंगे तो उन के खान=पान व स्वागत का कुल खर्च लगान में से काट दिया जायेगा.
  11. गाँव के टहलकर (कमीण) लोगों को जमीन मुफ्त दी जायेगी.
  12. जितनी भूमि पर आबादी होगी, उसका कोई लगान न होगा।
  13. इस खानदान में पैदा होने वाले सभी उत्तराधिकारी इन नियमों का पालन करेंगे।
  14. किसी भी निर्णय में मुखिया और गाँव का ठाकुर की बात को सर्वोपरि माना जायेगा !
कुछ दिनों तक इनमें से कुछ नियम आंशिक रूप से अनेक ठिकानों द्वारा ज्यों-के-त्यों अथवा कुछ हेर-फेर के साथ मने जाते रहे। कुछ ने एक प्रकार से कटाई इन नियमों को मेट दिया।
झुंझुनू का मुसलमान सरदार जिसे कि सरदार जुझार सिंह ने परास्त किया था, सादुल्ला नाम से मशहूर था। झुंझुनू किस समय सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना इस बात का वर्णन निम्न काव्य में मिलता है।
सत्रह सौ सत्यासी, आगण मास उदार
सादे लीन्हो झूंझणूं, सुदी आठें शनिवार
अर्थात - संवत १७८७ में अघन मास के सुदी पक्ष में शनिवार के दिन झुंझुनू को सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना.

समझोते का पालन नहीं

सरदार जुझार सिंह के बाद ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उनकी जाट जाति के लोग पराधीन होते गए। यहाँ तक कि वह अपनी नागरिक स्वाधीनता को भी खो बैठे. एक दिन जो राजा और सरदार थे उनको भी बादमें पक्के मकान बनाने के लिए जमीन खरीदनी पड़ती थी। उन पर बाईजी का लाग लगा और भेंट, न्यौता-कांसा अदि अनेक तरह की बेहूदी लाग और लगा दी गई।
झुंझुनू का अन्तिम नवाब रुहेल खान जो आस-पास के अपने ही वंश के नवाबों से प्रताड़ित था| ऐसे में शार्दूल सिंह शेखावत को यहाँ बुला लिया| रुहेल खान की मृत्यु के बाद विक्रम सम्वत १७८७ में झुंझुनू पर शेखावत राजपूतों का अधिपत्य हो गया जो जागीर अधिग्रहण तक चलता रहा|
शार्दूल सिंह के निधन के बाद उसके पाँच पुत्रों जोरावर सिंह, किशन सिंह, अक्षय सिंह, नवल सिंह और केशरी सिंह के बीच झुंझुनू ठिकाने का विभाजन हुआ| यही पंच्पना कहलाया| इतिहासकारों के अनुसार जोरावर सिंह व् उनके वंशजो के अधीन चौकड़ी, मलसीसर, मंडरेला, डाबडी, चानना, सुल्ताना, ओजटू, बगड़, टाई, गांगियासर, कलि पहाड़ी आदि का शासन था, जबकि किशन सिंह और उनके वंशज खेतड़ी , अलसीसर, हीरवा, अडूका, बदनगढ, सीगडा,तोगडा, बलरिया आदि के शासक रहे| नवल सिंह और उनके वंशजों के अधीन नवलगढ़, मंडवा, महनसर, मुकुंदगढ़, इस्माईलपुर, परसरामपुरा, कोलिंदा आदि की शासन व्यवस्था थी| जबकि केशरी सिंह व् उनके वंशजों का बिसाऊ, सुरजगढ और डून्डलोद में शासन रहा|  अक्षय सिंह चूँकि नि:संतान थे, अत: उनका हिस्सा अन्य भाइयों को दे दिया गया|
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ झुंझुनू जिले में व्याप्त जनाक्रोध कई आंदोलनों के रूप में सामने आया| स्वतंत्रता सैनानी सावलराम के अनुसार इस जनपद में आर्य समाज आन्दोलन, जकात आन्दोलन, जागीरदारों के खिलाफ आन्दोलन प्रजा मंडल आन्दोलन और अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन चले जो कमोबेश एक दुसरे के पूरक थे|
इतिहासकार मोहन सिंह लिखते हैं की जयपुर राज्य की सबसे बड़ी निजामत शेखावाटी थी जिसमा वर्तमान झुंझुनू और सीकर जिले की सम्पूर्ण सीमाएं थी| शेखावाटी निजामत का कार्यालय झुंझुनू में था| सन १८३४ में झुंझुनू एसा मजोर हेनरी फोस्टर ने एक जगह फौज का गठन किया था जिसका नाम शेखावाटी ब्रिगेड रखा गया| झुंझुनू में जिस जगह यह फौज रहती थी वह इलाका आज भी छावनी बाज़ार और छावनी मोहल्ला कहलाता हैं|
आज के समय में झुंझुनू जिले में शिक्षा का स्तर काफी हद तक पहुँच चुका है , जिले से काफी संख्या में आईएएस अधिकारी , आईपीएस अधिकारी , सेना अधिकारी , RAS अधिकारी सेवारत है | जिले में सैनिको को संख्या भी अत्यधिक मात्र में है |
झुंझुनू जिले में अनेक छोटे बड़े दर्शनीय स्थल है जैसे रानी सती का मंदिर, काली पहाड़ी, खेतड़ी महल आदि , साथ ही स्वामी विवेकानंद का संबंध भी खेतड़ी के राजा अजीत सिंह से रहा है जोकि इसी जिले के आधीन तहसील क्षेत्र है | खेतड़ी तहसील में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का कॉपर उप्रकम भी कार्यरत है झुंझुनू की सीमा हरियाणा से लगती है पचेरी, शिमला जैसे गाँव हरियाणा के गोद बलावा (कृष्ण नगर) के नजदीक है |
राजस्थान के शेखावाटी इलाके के तीन जिलों चूरू,सीकर और झुंझुनू में हुँ--देश के तमाम बड़े औद्योगिक घराने फिर चाहे वो बिरला हो,मित्तल या बजाज हो,डालमिया या रुइया हो,पोद्दार हो,गोयनका हो,देवरा हो या केडिया सब इसी शेखावटी माटी के लाल है। इसी माटी ने देश को सबसे ज्यादा वीर सपूत दिए जिन्होंने भारतीय फौज में देश के लिए लड़ते हुए वीरगति पाई
चारो तरफ बीहड़ इस माटी ने देश को ना जाने कितने सपूत दिए
आष्चर्यजनक रूप से एक सवाल जो कार में सफर करते बार बार मेरे मन में आ रहा था वो ये की आखिर क्या खास बात है शेखावटी की इस माटी में जो यहां से निकलने वाला हर छोरा देश का नाम दुनिया भर में रोशन करता है,या फौज में जाता है या व्यापारी बनता है
ना यहां पानी की भरमार है,न अनाज की पैदावार ज्यादा है,मिट्टी के टीले रेतीले है--वृक्ष भी फलदार नही है--हवा भी शुष्क है--गर्मी में भीषण गर्मी और ठंड में भीषण ठंड यहां के लोगो की मजबूरी है--पढ़ाई के लिए भी मशक्कत ज्यादा है,दूर दराज गाव के बच्चों को शहर कस्बे तक पढ़ाई के लिए आने में काफी दिक्कतों का सामाना करना पड़ता है
फिर कैसे यहां के बच्चे देश के टॉप इंडस्ट्रलिस्ट,चार्टर्ड अकाउंटेंट, आईएएस,लीडर,बिजनेसमैन, व्यापारी बनते है
लोगो से बात की,हवेलियों में,ढाबो पर रुका--बातचीत में लोगो का गजब का आत्मविश्वास,अभावो के चलते कुछ कर दिखाने की अदम्य इच्छाशक्ति मुझे सहज नज़र आई
कोई बच्चा नौकरी की बात नही कर रहा था,सब या तो व्यापारी, या बड़े ब्यूरोक्रेट,या सीए बनने की बात कर रहे थे
झुंझुनू में एक गाँव है मंडावा --इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मालिक रामनाथजी गोयनका इसी मंडावा गाव से है--मुम्बई के कई बिल्डर,व्यापारी भी इसी गांव से है--बगल में दूसरा गाव है बिसाऊ--मुम्बई की बड़ी चॉइस कम्पनी के पाटोदिया,पोद्दार,अग्रवाल इसी गाव के है--झुंझुनू जिले के एक और कस्बे पिलानी के देश के मशहूर औद्योगिक घराने आदित्य बिड़ला का परिवार बिलॉन्ग करता है--डालमिया भी यही के है--बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी फतेहपुर के है तो मुरली देवरा का परिवार सीकर लक्ष्मणगढ़ से बिलॉन्ग करते है--नवलगढ़ से मोरारका और सेठ अनंदराय पोद्दार परिवार,मलसीसर से लक्ष्मी मित्तल और रामगढ़ से रुइया परिवार की जड़े जुड़ी है--
पता करने पर यर बात पता चली की शेखावटी इलाके के तीनों जिलो में वैसे तो राजपूतो का वर्चस्व रहा है और है लेकिन यहां की वैश्य याने बनिया जिन्हें बड़े मारवाड़ी भी कहते है इन्होंने दुनिया भर में अपने व्यापारिक कला के दम पर राज किया--इनको व्यापारिक कलकुशलता से ज्यादा कुछ कर दिखाने की ललक ने इन्हें विश्वपटल पर पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई--
जिस सीकर,चूरू और झुंझुनू में सुविधाओं का अभाव हो वहां जहा कुछ पाने को ना हो इस इलाके के नौजवान जब मुम्बई,दिल्ली,कलकत्ता गए तब इनके पास खोने को कुछ नही था--इन्होंने जी भर कर रात दिन मेहनत की और कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए बड़ा एम्पायर खड़ा किया--इनकी एक सबसे बड़ी खासियत ये रही कि ये अपने इलाके शेखावटी लोगो को व्यापार धंधे में जोड़ते गए उनको आगे बढ़ाते गए,नए लोगो की टांग खींचने का काम नही किया बल्कि उन्हें सम्बल देकर मेहनत करना सिखाया और उनका मुकाम बनाया
सीकर,चूरू और झुंझुनू जिलो को खाटू श्यामजी भगवान,सालासर बालाजी,शाकम्बरी माता,जीन माता का पूरा आशीर्वाद रहा---
कहते है ना कि --अगर आप धन को कुआ भरकर भी रखोगे और मेहनत लगन से उसे और भरने के बजाय उसे खाली करते रहोगे तो एक दिन धन से भरा कुआं भी खाली हो जाएगा--
शेखावटी के वीर राजपूतो ने जहा देश के माटी की रक्षा की वही यहां के व्यापारियों ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपना अमूल्य योगदान दिया

झुंझुनू जिला

झुंझुनू जिला भारत के राजस्थान प्रान्त में स्थित है तथा सीकर एंव चूरु जिलों के नज़दीक है। 

भूगोल

झन्झुनू राजस्थान का एक जिला है। यह दिल्ली से २५० किलोमीटर और जयपुर से १८० किलोमीटर दुरी पर स्थित है। यह एक रेगिस्तानी इलाका है। पूर्व से पश्चिम कि सीमा ११० किलोमीटर व उत्तर से दक्षिण की सीमा १०० किलोमीटर है।
झन्झुनू जिला 27.5' से 28.5'उत्तरी अक्षांश तथा 75 से 76 डिग्री पूर्वी देशान्तर के मध्य है। इसका

जनसांख्यिकी

राजस्थान के जनगणना संचालन निदेशालय द्वारा राजस्थान के एक जिले झुनझुनुन (झुनझुनू) की आधिकारिक जनगणना 2011 की जानकारी जारी की गई है। राजस्थान के झुनझुनुन जिले में जनगणना अधिकारियों ने महत्वपूर्ण व्यक्तियों की गणना भी की थी।
2011 में, झुनझुनुन की जनसंख्या 2,137,045 थी, जिसमें पुरुष और महिला क्रमशः 1,095,8 9 6 और 1,041,14 9 थीं। 2001 की जनगणना में, झुनझुनुन की आबादी 1,913,68 9 थी, जिनमें से पुरुष 983,526 थे और शेष 930,163 महिलाएं थीं। झुनझुनुन जिला जनसंख्या कुल महाराष्ट्र आबादी का 3.12 प्रतिशत गठित। 2001 की जनगणना में, झुनझुनुन जिले के लिए यह आंकड़ा महाराष्ट्र आबादी का 3.3 9 प्रतिशत था।
2001 के अनुसार आबादी की तुलना में जनसंख्या में 11.67 प्रतिशत परिवर्तन हुआ था। भारत की पिछली जनगणना में, झुनझुनुन जिले में 1 99 1 की तुलना में इसकी आबादी में 36.90 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
2011 की जनगणना के लिए कुल झुनझुनुन जनसंख्या में से 22.8 9 प्रतिशत जिले के शहरी क्षेत्रों में रहता है। शहरी इलाकों में कुल 48 9, 7 9 7 लोग रहते हैं जिनमें से पुरुष 253,178 हैं और महिलाएं 235, 9 01 हैं। 2011 जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक झुनझुनुन जिले के शहरी क्षेत्र में सेक्स अनुपात 932 है। इसी प्रकार 2011 की जनगणना में झुनझुनुन जिले में बाल लिंग अनुपात 854 था। शहरी क्षेत्र में बाल आबादी (0-6) 65,951 थी जिसमें से पुरुष और महिलाएं 35,579 और 30,372 थीं। झुनझुनुन जिले का यह बाल आबादी कुल शहरी आबादी का 14.05% है। जनगणना 2011 के अनुसार झुनझुनुन जिले में औसत साक्षरता दर 76.53% है जिसमें से पुरुष और महिला क्रमशः 87.3 9% और 65.03% साक्षर हैं। वास्तविक संख्या में शहरी क्षेत्र में 323,811 लोग साक्षर हैं, जिनमें से पुरुष और महिलाएं क्रमशः 190,162 और 133,64 9 हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, झुनझुनुन जिलों की 77.11% आबादी गांवों के ग्रामीण इलाकों में रहती है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली कुल झुनझुनुन जिला आबादी 1,647, 9 66 है, जिनमें से पुरुष और महिला क्रमशः 842,718 और 805,248 हैं। झुनझुनुन जिले के ग्रामीण इलाकों में लिंग अनुपात प्रति 1000 पुरुष 956 महिलाएं हैं। यदि झुनझुनुन जिले के बाल लिंग अनुपात के आंकड़ों पर विचार किया जाता है, तो प्रति 1000 लड़कों की संख्या 832 लड़कियां हैं। ग्रामीण इलाकों में 0-6 वर्ष की उम्र में बाल आबादी 222,519 है, जिनमें से पुरुष 121,483 थे और महिलाएं 101,036 थीं। झुंजुनुन जिले की कुल ग्रामीण आबादी में बाल आबादी में 14.42% शामिल है। झुनझुनुन जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता दर जनगणना डेटा 2011 के मुकाबले 73.42% है। लिंग के अनुसार पुरुष और महिला साक्षरता क्रमश: 86.75 और 59.77 प्रतिशत थी। कुल मिलाकर, 1,046,549 लोग साक्षर थे जिनमें से पुरुष और महिला क्रमश: 625,672 और 420,877 थीं।

आदर्श स्थल

बगडबख्तावरपुराचिडावापिलानी, उदयपूर वाटी , मंडावा , नवलगढ़,तोगड़ा कलां आदि कस्बे इसी में है। झुंझुनूं का नाम लेते ही मन जोश एवं श्रद्धा से भर जाता है। यहां के जर्रे-जर्रे से उठने वाली देशभक्ति की आवाज से जोश तो गांव-गांव में स्थापित शहीदों की प्रतिमाओं को देखकर मन में श्रद्धा का भाव स्वतः ही आ जाता है।झुंझुनूं ही एक ऐसा जिला है जिसने पूरे देेेश में सबसे ज्यादा सैनिक दिए है, सेना में जाने तथा मातृभूमि के लिए शहीद होने का जज्बा जैसा यहां दिखाई देता है, शायद ही कहीं पर दिखाई दे। बात चाहे आजादी से पहले की हो या बाद की, जिले के जाबांज सैनिकों ने दुश्मनों के दांत खट्‌टे कर अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया। वीरता के बाद झुंझुनूं का धर्म-कर्म के मामले में अलग मुकाम है। यहां जिला मुख्यालय पर स्थित दादी राणीसती का मंदिर तो विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। झुंझुनूं में हजरत कमरुद्दीन शाह की दरगाह एवं चंचलनाथ जी टीला अपने आप में अनूठे हैं। बताया जाता है कि हजरत कमरुद्दीन एवं चंचलनाथ में गहरी दोस्ती थी। दोनों का साम्प्रदायिक सद्‌भाव भी गजब का था। तभी तो झुंझुनूं में आज भी दोनों जगह होने वाले कार्यक्रमों में गंगा-जमुनी संस्कृति का झलक दिखाई देती है।
यहां पर प्राचीन शिक्षा के केंद्र रहे हैं जिनमें पिलानी का नाम आता है

खेतड़ी महल

खेतड़ी महल झुंझुनू की सबसे खूबसूरत और बेहतरीन वास्तुकला में से एक है। यह झुंझुनू के हवा महल के रूप में भी जाना जाता है।
खेतड़ी महल
Khetri Mahal
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खेतड़ी महल का एक दृश्य
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निर्माण:1770
वास्तु शैली(याँ):शेखावाटी वास्तुशैली

इतिहास

खेतड़ी महल का निर्माण भोपाल सिंह द्वारा लगभग 1770 में किया गया था। भोपाल सिंह शार्दुल सिंह का पोता था। यह पता चला है कि प्रसिद्ध खेतड़ी महल किसी भी प्रकार के दरवाजे या खिड़कियां से रहित है इसीलिए इसे हवा महल के रूप में जाना जा रहा है। जयपुर के सवाई प्रताप सिंह इस अनोखी संरचना से इतने प्रेरित हुए कि 1799 में भव्य और ऐतिहासिक हवा महल का निर्माण जयपुर में किया। खेतड़ी दूसरे सबसे धनी 'ठिकाना' जयपुर के तहत माना जाता था।.[1]

वास्तुकला

खेतड़ी महल गलियों की एक श्रृंखला के पीछे स्थित है। यह शेखावाटी कला और स्थापत्य कला के विश्वसनीय उदाहरणो में से एक माना जाता है।[2] यह मुख्य रूप से भित्ति चित्रों और उत्तम सरणियों के लिए जाना जाता है जो कि रघुनाथ मंदिर और भोपालगढ़ किले से समर्थित है। इसकी विशिष्टता हवा के सतत प्रवाह में निहित है, जो सदा ही इस संरचना के कई अन्य ऐसे इमारतों से अलग खड़ा करता है।
महल की हवा महल जैसी वास्तुकला
खंभे जो कभी संभवतया महल में हवा के सतत प्रवाह बनाए रखने के लिए जाने जाते थे अब उन्होंने विशाल दीवार संरचनाओं जगह ले ली है।
प्रवेश द्वार से महल की विशाल छत के लिए एक लंबा रैंप किसी का भी अग्रणी रूप से ध्यान आकर्षित कर सकता हैं। यह विशेष रूप से उनके घोड़ों की सवारी में राजपूतों को आसानी प्रदान करने के लिए बनायागया था। वास्तव में महल के विभिन्न स्तरों ऐसे रैंप की एक श्रृंखला के माध्यम से छत के साथ संयुक्त किया गया हैं। इन रैंप का एक अन्य उद्देश्य 'ठाकुरों' बहुत प्रयास के बिना उनके विषयों पर नीचे टकटकी करने के लिए पर्याप्त उच्च मंच प्रदान करने के लिए किया गया था। छत से दृश्य विशेष रूप से अवलोकन के लायक है। हम ठाकुरों के निजी कक्ष में खो युग चित्रों के टुकड़े के साथ दो छोटे पहरेवाली खोज कर सकते हैं। इन चित्रों में से अधिकांश प्राकृतिक पृथ्वी पिगमेंट में थे। खेतड़ी महल के अंदर, एक जटिल डिजाइन मेहराब और खंभे के साथ बहुत बड़ा सुंदर हॉल तलाश कर सकते हैं। सबसे अदभुत खोज आप खेतड़ी महल में कर सकते हैं कि यहाँ किसी भी प्रकार के कोई दरवाजे या खिड़कियां नहीं है, जो कि अन्य महलो से भिन्न है।
खेतड़ी महल की सुंदर वास्तुकला डिजाइन
महल के अधिकांश कमरे मेहराब और स्तंभों की एक अच्छी तरह से डिजाइन श्रृंखला के द्वारा एक दूसरे के माध्यम से जुड़े हुए हैं। ये मेहराब और कॉलम महल के लिए एक सुंदर सममित दृश्य प्रदान करते हैं। सदियों पुरानी चूना प्लास्टर अपने स्वयं के महिमा के लिए छोड़ दिया गया है और यह एक गुलाबी चमक है। हालांकि खेतड़ी महल पर कोई संदेह नहीं कि यह शेखावाटी युग की दुर्लभ और अद्वितीय संरचनाओं में से एक है, लेकिन इस इमारत की लाचार राज्य एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है। इस तरह की वास्तुकला दुर्लभ है और जल्द ही लुप्त हो सकती है। इसका रखरखाव करना, इन अनोखी संरचना के संरक्षण और भित्ति चित्र निश्चित रूप से हमारे भारतीय पर्यटन और संस्कृति के लिए एक भारी बढ़ावा हो सकता है।



जयपुर का इतिहास

जयपुर का इतिहास

जयपुर
शहर
Skyline of जयपुर
देशभारत
राज्यराजस्थान
ज़िलाजयपुर
जनसंख्या (2011)[1]
 • कुल30,46,163
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वेबसाइटwww.jaipur.rajasthan.gov.in
जयपुर  जिसे गुलाबी नगर के नाम से भी जाना जाता है, जो में राजस्थान राज्य की राजधानी है। आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन रजवाड़े की भी राजधानी रहा है। इस शहर की स्थापना १७२८ में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी। जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस-संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।[2] यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घिरा हुआ है।[3] जयपुर शहर की पहचान यहाँ के महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य की खूबी है। १८७६ में तत्कालीन महाराज सवाई रामसिंह ने इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रिंस ऑफ वेल्स युवराज अल्बर्ट के स्वागत में पूरे शहर को गुलाबी रंग से आच्छादित करवा दिया था। तभी से शहर का नाम गुलाबी नगरी पड़ा है। 2011 की जनगणना के अनुसार जयपुर भारत का दसवां सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर है। राजा जयसिंह द्वितीय के नाम पर ही इस शहर का नाम जयपुर पड़ा। जयपुर भारत के टूरिस्ट सर्किट गोल्डन ट्रायंगल (India's Golden Triangle) का हिस्सा भी है। इस गोल्डन ट्रायंगल में दिल्ली ,आगरा और जयपुर आते हैं भारत के मानचित्र में उनकी स्थिति अर्थात लोकेशन को देखने पर यह एक त्रिभुज (Triangle) का आकार लेते हैं। इस कारण इन्हें भारत का स्वर्णिम त्रिभुज इंडियन गोल्डन ट्रायंगल कहते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली से जयपुर की दूरी 280 किलोमीटर है। [4]
शहर चारों ओर से दीवारों और परकोटों से घिरा हुआ है, जिसमें प्रवेश के लिए सात दरवाजे हैं।[4] बाद में एक और द्वार भी बना जो 'न्यू गेट' कहलाया।[5] पूरा शहर करीब छह भागों में बँटा है और यह १११ फुट (३४ मी.) चौड़ी सड़कों से विभाजित है। पाँच भाग मध्य प्रासाद भाग को पूर्वी, दक्षिणी एवं पश्चिमी ओर से घेरे हुए हैं और छठा भाग एकदम पूर्व में स्थित है। प्रासाद भाग में हवा महल परिसर, व्यवस्थित उद्यान एवं एक छोटी झील हैं। पुराने शहर के उत्तर-पश्चिमी ओर पहाड़ी पर नाहरगढ़ दुर्ग शहर के मुकुट के समान दिखता है। इसके अलावा यहां मध्य भाग में ही सवाई जयसिंह द्वारा बनावायी गईं वेधशाला, जंतर मंतर, जयपुर भी हैं।[4]
जयपुर को आधुनिक शहरी योजनाकारों द्वारा सबसे नियोजित और व्यवस्थित शहरों में से गिना जाता है। देश के सबसे प्रतिभाशाली वास्तुकारों में इस शहर के वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य का नाम सम्मान से लिया जाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान इस पर कछवाहा समुदाय के राजपूत शासकों का शासन था। १९वीं सदी में इस शहर का विस्तार शुरु हुआ तब इसकी जनसंख्या १,६०,००० थी जो अब बढ़ कर २००१ के आंकड़ों के अनुसार २३,३४,३१९ और २०१२ के बाद ३५ लाख हो चुकी है। यहाँ के मुख्य उद्योगों में धातुसंगमरमर, वस्त्र-छपाई, हस्त-कला, रत्न व आभूषण का आयात-निर्यात तथा पर्यटन-उद्योग आदि शामिल हैं। जयपुर को भारत का पेरिस भी कहा जाता है। इस शहर के वास्तु के बारे में कहा जाता है कि शहर को सूत से नाप लीजिये, नाप-जोख में एक बाल के बराबर भी फ़र्क नहीं मिलेगा।

इतिहास

सत्रहवीं शताब्दी में जब मुगल अपनी ताकत खोने लगे, तो समूचे भारत में अराजकता सिर उठाने लगी, ऐसे दौर में राजपूताना की आमेर रियासत, एक बडी ताकत के रूप में उभरी.जाहिर है कि महाराजा सवाई जयसिंहको तब मीलों के दायरे में फ़ैली अपनी रियासत संभालने और सुचारु राजकाज संचालन के लिये आमेर छोटा लगने लगा और इस तरह से इस नई राजधानी के रूप में जयपुर की कल्पना की गई। इस शहर की नींव पहले पहल कहां रखी गई, इसके बारे में मतभेद हैं, किंतु कुछ इतिहासकारों के अनुसार तालकटोरा के निकट स्थित शिकार की होदी से इस शहर के निर्माण की शुरुआत हुई। कुछ इसे ब्रह्मपुरी और कुछ आमेर के पास एक स्थान 'यज्ञयूप' स्थल से मानते हैं। पर ये निर्विवाद है संबसे पहले चन्द्रमहल बना और फिर बाज़ार और साथ में तीन चौपड़ें |
सवाई जयसिंह ने यह शहर बसाने से पहले इसकी सुरक्षा की भी काफी चिंता की थी और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही सात मजबूत दरवाजों के साथ किलाबंदी की गई थी। जयसिंह ने हालाँकि मराठों के हमलों की चिंता से अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनवाई थी, लेकिन उन्हें शायद मौजूदा समय की सुरक्षा समस्याओं का भान नहीं था। इतिहास की पुस्तकों में जयपुर के इतिहास के अनुसार यह देश का पहला पूरी योजना से बनाया गया शहर था और स्थापना के समय राजा जयसिंह ने अपनी राजधानी आमेर में बढ़ती आबादी और पानी की समस्या को ध्यान में रखकर ही इसका विकास किया था। नगर के निर्माण का काम १७२७ में शुरू हुआ और प्रमुख स्थानों के बनने में करीब चार साल लगे। यह शहर नौ खंडों में विभाजित किया गया था, जिसमें दो खंडों में राजकीय इमारतें और राजमहलों को बसाया गया था। प्राचीन भारतीय शिल्पशास्त्र के आधार पर निर्मित इस नगर के प्रमुख वास्तुविद थे एक बंगाली ब्राह्मण विद्याधर (चक्रवर्ती)]], जो आमेर दरबार की 'कचहरी-मुस्तफी' में आरम्भ में महज़ एक नायब-दरोगा (लेखा-लिपिक) थे, पर उनकी वास्तुकला में गहरी दिलचस्पी और असाधारण योग्यता से प्रभावित हो कर महाराजा ने उन्हें नयी राजधानी के लिए नए नगर की योजना बनाने का निर्देश दिया।
यह शहर प्रारंभ से ही 'गुलाबी' नगर नहीं था बल्कि अन्य सामान्य नगरों की ही तरह था, लेकिन 1876 में जब वेल्स के राजकुमार आए तो महाराजा रामसिंह (द्वितीय) के आदेश से पूरे शहर को गुलाबी रंग से जादुई आकर्षण प्रदान करने की कोशिश की गई थी। उसी के बाद से यह शहर 'गुलाबी नगरी' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुंदर भवनों के आकर्षक स्थापत्य वाले, दो सौ वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले जयपुर में जलमहल, जंतर-मंतर, आमेर महल, नाहरगढ़ का किला, हवामहल और आमेर का किला राजपूतों के वास्तुशिल्प के बेजोड़ नमूने हैं।

स्थापत्य

नियोजित तरीके से बसाये गये इस जयपुर में महाराजा के महल, औहदेदारों की हवेली और बाग बगीचे, ही नहीं बल्कि आम नागरिकों के आवास और राजमार्ग]बनाये गये। गलियों का और सडकों का निर्माण वास्तु के अनुसार और ज्यामितीय तरीके से किया गया,नगर को सुरक्षित रखने के लिये, इस नगर के चारों ओर एक परकोटा बनवाया गया। पश्चिमी पहाडी पर नाहरगढ का किला बनवाया गया। पुराने दुर्ग जयगढ में हथियार बनाने का कारखाना बनवाया गया, जिसे देख कर आज भी वैज्ञानिक चकित हो जाते हैं, इस कारखाने और अपने शहर जयपुर के निर्माता सवाई जयसिंह की स्मॄतियों को संजोये विशालकाय जयबाण तोप आज भी सीना ताने इस नगर की सुरक्षा करती महसूस होती है। महाराजा सवाई जयसिंह ने जयपुर को नौ आवासीय खण्डों में बसाया, जिन्हें चौकडी कहा जाता है, इनमे सबसे बडी चौकडी सरहद में राजमहल,रनिवास,जंतर मंतर,गोविंददेवजी का मंदिर, आदि हैं, शेष चौकडियों में नागरिक आवास, हवेलियां और कारखाने आदि बनवाये गये। प्रजा को अपना परिवार समझने वाले सवाई जयसिंह ने सुन्दर शहर को इस तरह से बसाया कि यहां पर नागरिकों को मूलभूत आवश्यकताओं के साथ अन्य किसी प्रकार की कमी न हो, सुचारु पेयजल व्यवस्था, बाग-बगीचे, कल कारखाने आदि के साथ वर्षाजल का संरक्षण और निकासी का प्रबंध भी करवाया.सवाई जयसिंह ने लम्बे समय तक जयपुर में राज किया, इस शहर में हस्तकला,गीत संगीत,शिक्षा और रोजगार आदि को उन्होने खूब प्रोत्साहित किया। अलग २ समय में वास्तु के अनुरुप ईसरलाट,हवामहल,रामनिवास बागऔरविभिन्न कलात्मक मंदिर, शिक्षण संस्थानों आदि का निर्माण करवाया गया।
बाजार- जयपुर प्रेमी कहते हैं कि जयपुर के सौन्दर्य को को देखने के लिये कुछ खास नजर चाहिये, बाजारों से गुजरते हुए, जयपुर की बनावट की कल्पना को आत्मसात कर इसे निहारें तो पल भर में इसका सौन्दर्य आंखों के सामने प्रकट होने लगता है। लम्बी चौडी और ऊंची प्राचीर तीन ओर फ़ैली पर्वतमाला सीधे सपाट राजमार्ग गलियां चौराहे चौपड भव्य राजप्रसाद.मंदिर और हवेली, बाग बगीचे,जलाशय और गुलाबी आभा से सजा यह शहर इन्द्रपुरी का आभास देने लगता है,जलाशय तो अब नहीं रहे, किन्तु कल्पना की जा सकती है, कि अब से कुछ दशक पहले ही जयपुर परकोटे में ही सिमटा हुआ था, तब इसका भव्य एवं कलात्मक रूप हर किसी को मन्त्र मुग्ध कर देता होगा। आज भी जयपुर यहां आने वाले सैलानियों को बरसों बरस सहेज कर रखने वाले रोमांचकारी अनुभव देता है।

जयपुर का बदलाव

जयपुर की रंगत अब बदल रही है। हाल ही में जयपुर को विश्व के दस सबसे खूबसूरत शहरों में शामिल किया गया है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] महानगर बनने की ओर अग्रसर जयपुर में स्वतन्त्रता के बाद कई महत्वाकांक्षी निर्माण हुए। एशिया की सबसे बडी आवासीय बस्ती मानसरोवर, राज्य का सबसे बड़ा सवाई मानसिंह चिकित्सालयविधानसभा भवनअमर जवान ज्योति, एम.आई.रोड, सेन्ट्रल पार्क और विश्व के प्रसिद्ध बैंक इसी कड़ी में शामिल हैं। पिछले कुछ सालों से जयपुर में मेट्रो संस्कॄति के दर्शन होने लगे हैं। चमचमाती सडकें, बहुमंजिला शापिंग माल, आधुनिकता को छूती आवासीय कालोनियां, आदि महानगरों की होड करती दिखती हैं। पुराने जयपुर और नये जयपुर में नई और पुरानी संस्कॄति के दर्शन जैसे इस शहर के विकास और इतिहास दोनों को स्पष्ट करते हैं। जयपुर कितना भी बदले पर इसके व्यंजनों का जायका बदस्तूर कायम है। जयपुर के व्यंजन में प्रसिद्ध दाल बाटी चूरमा, केर सांगरिया की सब्जी, मालपुआ इत्यादि है।

दर्शनीय स्थल

मुख्य लेख: 

शहर में बहुत से पर्यटन आकर्षण हैं, जैसे जंतर मंतर, जयपुरहवा महलसिटी पैलेसगोविंद देवजी का मंदिरश्री लक्ष्मी जगदीश महाराज मंदिर, बी एम बिड़ला तारामण्डलआमेर का किलाजयगढ़ दुर्ग आदि। जयपुर के रौनक भरे बाजारों में दुकानें रंग बिरंगे सामानों से भरी हैं, जिनमें हथकरघा उत्पाद, बहुमूल्य पत्थर, हस्तकला से युक्त वनस्पति रंगों से बने वस्त्र, मीनाकारी आभूषण, पीतल का सजावटी सामान, राजस्थानी चित्रकला के नमूने, नागरा-मोजरी जूतियाँ, ब्लू पॉटरी, हाथीदांत के हस्तशिल्प और सफ़ेद संगमरमर की मूर्तियां आदि शामिल हैं। प्रसिद्ध बाजारों में जौहरी बाजार, बापू बाजार, नेहरू बाजार, चौड़ा रास्ता, त्रिपोलिया बाजार और एम.आई. रोड़ के साथ लगे बाजार हैं।[6]
सिटी पैलेस
राजस्थानी व मुगल शैलियों की मिश्रित रचना एक पूर्व शाही निवास जो पुराने शहर के बीचोंबीच है। भूरे संगमरमर के स्तंभों पर टिके नक्काशीदार मेहराब, सोने व रंगीन पत्थरों की फूलों वाली आकृतियों ले अलंकृत है। संगमरमर के दो नक्काशीदार हाथी प्रवेश द्वार पर प्रहरी की तरह खड़े है। जिन परिवारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजाओं की सेवा की है। वे लोग गाइड के रूप में कार्य करते है। पैलेस में एक संग्राहलय है जिसमें राजस्थानी पोशाकों व मुगलों तथा राजपूतों के हथियार का बढ़िया संग्रह हैं। इसमें विभिन्न रंगों व आकारों वाली तराशी हुई मूंठ की तलवारें भी हैं, जिनमें से कई मीनाकारी के जड़ऊ काम व जवाहरातों से अलंकृत है तथा शानदार जड़ी हुई म्यानों से युक्त हैं। महल में एक कलादीर्घा भी हैं जिसमें लघुचित्रों, कालीनों, शाही साजों सामान और अरबी, फारसी, लेटिन व संस्कृत में दुर्लभ खगोल विज्ञान की रचनाओं का उत्कृष्ट संग्रह है जो सवाई जयसिंह द्वितीय ने विस्तृत रूप से खगोल विज्ञान का अध्ययन करने के लिए प्राप्त की थी।
जंतर मंतर, जयपुर
एक पत्थर की वेधशाला। यह जयसिंह की पाँच वेधशालाओं में से सबसे विशाल है। इसके जटिल यंत्र, इसका विन्यास व आकार वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया गया है। यह विश्वप्रसिद्ध वेधशाला जिसे २०१२ में यूनेस्को ने विश्व धरोहरों में शामिल किया है, मध्ययुगीन भारत के खगोलविज्ञान की उपलब्धियों का जीवंत नमूना है! इनमें सबसे प्रभावशाली रामयंत्र है जिसका इस्तेमाल ऊंचाई नापने के लिए (?) किया जाता है।
हवा महल
ईसवी सन् 1799 में निर्मित हवा महल राजपूत स्थापत्य का मुख्य प्रमाण चिन्ह। पुरानी नगरी की मुख्य गलियों के साथ यह पाँच मंजिली इमारत गुलाबी रंग में अर्धअष्टभुजाकार और परिष्कृत छतेदार बलुए पत्थर की खिड़कियों से सुसज्जित है। शाही स्त्रियां शहर का दैनिक जीवन व शहर के जुलूस देख सकें इसी उद्देश्य से इमारत की रचना की गई थी। हवा महल में कुल 953 खिड़कियाँ हैं| इन खिडकियों से जब हवा एक खिड़की से दूसरी ख्दिकी में होकर गुजरती हैं तो ऐसा महसूस होता है जैसे पंखा चल रहा हैं| आपको हवा महल में खड़े होकर शुद्ध और ताज़ी हवा का पूर्ण एहसास होगा|[7]
गोविंद देवजी का मंदिर
भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्ध, बिना शिखर का मंदिर। यह चन्द्रमहल के पूर्व में बने जन-निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है। संरक्षक देवता गोविंदजी की मूर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था।
सरगासूली-
(ईसर लाट) - त्रिपोलिया बाजार के पश्चिमी किनारे पर उच्च मीनारनुमा इमारत जिसका निर्माण ईसवी सन् 1749 में सवाई ईश्वरी सिंह ने अपनी मराठा विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
रामनिवास बाग
एक चिड़ियाघर, पौधघर, वनस्पति संग्रहालय से युक्त एक हरा भरा विस्तृत बाग, जहाँ खेल का प्रसिद्ध क्रिकेट मैदान भी है। बाढ राहत परियोजना के अंतर्गत ईसवी सन् 1865 में सवाई राम सिंह द्वितीय ने इसे बनवाया था। सर विंस्टन जैकब द्वारा रूपांकित, अल्बर्ट हाल जो भारतीय वास्तुकला शैली का परिष्कृत नमूना है, जिसे बाद में उत्कृष्ट मूर्तियों, चित्रों, सज्जित बर्तनों, प्राकृतिक विज्ञान के नमूनों, इजिप्ट की एक ममी और फारस के प्रख्यात कालीनों से सुसज्जित कर खोला गया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के लिए एक प्रेक्षागृह के साथ रवीन्द्र मंच, एक आधुनिक कलादीर्घा व एक खुला थियेटर भी इसमें बनाया गया हैं।
गुड़िया घर -
(समयः 12 बजे से सात बजे तक)- पुलिस स्मारक के पास मूक बधिर विद्यालय के अहाते में विभिन्न देशों की प्यारी गुड़ियाँ यहाँ प्रदर्शित हैं।
बी एम बिड़ला तारामण्डल
(समयः 12 बजे से सात बजे तक)- अपने आधुनिक कम्पयूटरयुक्त प्रक्षेपण व्यवस्था के साथ इस ताराघर में श्रव्य व दृश्य शिक्षा व मनोरंजनों के साधनों की अनेखी सुविधा उपलब्घ है। विद्यालयों के दलों के लिये रियायत उपलब्ध है। प्रत्येक महीने के आखिरी बुघवार को यह बंद रहता है।
गलताजी
एक प्राचीन तार्थस्थल, निचली पहाड़ियों के बीच बगीचों से परे स्थित। मंदिर, मंडप और पवित्र कुंडो के साथ हरियाली युक्त प्राकृतिक दृश्य इसे आनन्ददायक स्थल बना देते हैं। दीवान कृपाराम द्वारा निर्मित उच्चतम चोटी के शिखर पर बना सूर्य देवता का छोटा मंदिर शहर के सारे स्थानों से दिखाई पड़ता है।
जैन मंदिर
आगरा मार्ग पर बने इस उत्कृष्ट जैन मंदिर की दीवारों पर जयपुर शैली में उन्नीसवीं सदी के अत्यधिक सुंदर चित्र बने हैं।
मोती डूंगरी और लक्ष्मी नारायण मंदिर
मोती डूंगरी एक निजी पहाड़ी ऊंचाई पर बना किला है जो स्कॉटलैण्ड के किले की तरह निर्मित है। कुछ वर्षों पहले, पहाड़ी पादगिरी पर बना गणेश मंदिर और अद्भुत लक्ष्मी नारायण मंदिर भी उल्लेखनीय है।
स्टैच्यू सर्किल - चक्कर के मध्य सवाई जयसिंह का स्टैच्यू बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से बना हुआ है। इसे जयपुर के संस्थापक को श्रद्धांजलि देने के लिए नई क्षेत्रीय योजना के अंतर्गत बनाया गया है। इस में स्थापित सवाई जयसिंह की भव्यमूर्ति के मूर्तिशिल्पी स्व.महेंद्र कुमार दास हैं।
अन्य स्थल
आमेर मार्ग पर रामगढ़ मार्ग के चौराहे के पास रानियों की याद में बनी आकर्षक महारानी की कई छतरियां है। मानसागर झील के मध्य, सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा निर्मित जल महल, एक मनोहारी स्थल है। परिष्कृत मंदिरों व बगीचों वाले कनक वृंदावन भवन की पुरातन पूर्णता को विगत समय में पुनर्निर्मित किया गया है। इस सड़क के पश्चिम में गैटोर में शाही शमशान घाट है जिसमें जयपुर के सवाई ईश्वरी सिंह के सिवाय समस्त शासकों के भव्य स्मारक हैं। बारीक नक्काशी व लालित्यपूर्ण आकार से युक्त सवाई जयसिंह द्वितीय की बहुत ही प्रभावशाली छतरी है। प्राकृतिक पृष्ठभूमि से युक्त बगीचे आगरा मार्ग पर दीवारों से घिरे शहर के दक्षिण पूर्वी कोने पर घाटी में फैले हुए हैं।
गैटोर
सिसोदिया रानी के बाग में फव्वारों, पानी की नहरों, व चित्रित मंडपों के साथ पंक्तिबद्ध बहुस्तरीय बगीचे हैं व बैठकों के कमरे हैं। अन्य बगीचों में, विद्याधर का बाग बहुत ही अच्छे ढ़ग से संरक्षित बाग है, इसमें घने वृक्ष, बहता पानी व खुले मंडप हैं। इसे शहर के नियोजक विद्याधर ने निर्मित किया था।
आमेर
यह कभी सात सदी तक ढूंडार के पुराने राज्य के कच्छवाहा शासकों की राजधानी थी।
आमेर और शीला माता मंदिर - लगभग दो शताब्दी पूर्व राजा मान सिंह, मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित महलों, मंडपों, बगीचों और मंदिरों का एक आकर्षक भवन है। मावठा झील के शान्त पानी से यह महल सीधा उभरता है और वहाँ सुगम रास्ते द्वारा पहुंचा जा सकता है। सिंह पोल और जलेब चौक तक अकसर पर्यटक हाथी पर सवार होकर जाते हैं। चौक के सिरे से सीढ़ियों की पंक्तियाँ उठती हैं, एक शिला माता के मंदिर की ओर जाती है और दूसरी महल के भवन की ओर। यहां स्थापित करने के लिए राजा मानसिंह द्वारा संरक्षक देवी की मूर्ति, जिसकी पूजा हजारों श्रद्धालु करते है, पूर्वी बंगाल (जो अब बंगला देश है) के जेसोर से यहां लाई गई थी। एक दर्शनीय स्तंभों वाला हॉल दीवान-ए-आम और एक दोमंजिला चित्रित प्रवेशद्वार, गणेश पोल आगे के प्रांगण में है। गलियारे के पीछे चारबाग की तरह का एक रमणीय छोटा बगीचा है जिसकी दाई तरफ सुख निवास है और बाई तरफ जसमंदिर। इसमें मुगल व राजपूत वास्तुकला का मिश्रित है, बारीक ढंग से नक्काशी की हुई जाली की चिलमन, बारीक शीशों और गचकारी का कार्य और चित्रित व नक्काशीदार निचली दीवारें। मावठा झील के मध्य में सही अनुपातित मोहन बाड़ी या केसर क्यारी और उसके पूर्वी किनारे पर दिलराम बाग ऊपर बने महलों का मनोहर दृश्य दिखाते है।
पुराना शहर - कभी राजाओं, हस्तशिल्पों व आम जनता का आवास आमेर का पुराना क़स्बा अब खंडहर बन गया है। आकर्षक ढंग से नक्काशीदार व सुनियोजित जगत शिरोमणि मंदिर, मीराबाई से जुड़ा एक कृष्ण मंदिर, नरसिंहजी का पुराना मंदिर व अच्छे ढंग से बना सीढ़ियों वाला कुआँ, पन्ना मियां का कुण्ड समृद्ध अतीत के अवशेष हैं।
जयगढ़ किला
मध्ययुगीन भारत के कुछ सैनिक इमारतों में से एक। महलों, बगीचों, टांकियों, अन्य भन्डार, शस्त्रागार, एक सुनोयोजित तोप ढलाई-घर, अनेक मंदिर, एक लंबा बुर्ज और एक विशालकाय तोप - जयबाण जो देश की सबसे बड़ी तोपों में से एक है। जयगढ़ के फैले हुए परकोटे, बुर्ज और प्रवेश द्वार पश्चिमी द्वार क्षितिज को छूते हैं। नाहरगढः जयगढ की पहाड़ियों के पीछे स्थित गुलाबी शहर का पहरेदार है - नाहरगढ़ किला। यद्यपि इसका बहुत कुछ हिस्सा ध्वस्त हो गया है, फिर भी सवाई मान सिंह द्वितीय व सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा बनाई मनोहर इमारतें किले की रौनक बढाती हैं सांगानेर - (१२ किलोमीटर) - यह टोंक जाने वाले राजमार्ग पर स्थित है। इसके ध्वस्त महलों के अतिरिक्त, सांगानेर के उत्कृष्ट नक्काशीदार जैन मंदिर है। दो त्रिपोलिया (तीन मुख्य द्वार) के अवशेषो द्वारा नगर में प्रवेश किया जाता है।
शिल्प उद्योग के लिए शहर महत्वपूर्ण केन्द्र है और ठप्पे व जालीदार छपाई की इकाइयों द्वारा हाथ से बने बढिया कपड़े यहां बनते है। यह कपड़ा देश व विदेश में प्रसिद्ध है।
दूरी -(१८ किलोमीटर) जयपुर की छोटी काशी के उपनाम से विख्यात कस्बा. जयपुर एवं दौसा जिले के ग्रामीण अंचल के आराध्य श्री लक्ष्मी जगदीश महाराज मंदिर का भव्य एवं प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर स्थित है। इसके अतिरिक्त ऐतिहासिक प्राचीन किला, बावड़ियाँ एवं जगन्नाथ सागर तालाब स्थित है। राज्य स्तरीय राज्य शैक्षिक प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान तथा जिला स्तरीय जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान स्थित है।
बगरू - (३४ किलोमीटर) - अजमेर मार्ग पर, पुराना किला, अभी भी अच्छी अवस्था में है। यह अपने हाथ की छपाई के हथकरघा उद्योग के लिए उल्लेखनीय है, जहां सरल तकनीको का प्रयोग होता है। इस हथकरघाओं के डिजाइन कम जटिल व मटियाले रंगो के होते है।
रामगढ़ झील - (३२ किलोमीटर उत्तर - पूर्व) - पेड़ो से आच्छादित पहाड़ियो के बीच एक ऊंचा बांध बांध कर एक विशाल कृत्रिम झील की निर्माण किया गया है। यद्यपि जमवा माता का मंदिर व पुराने किले के खंडहर इसके पुरावशेष है। विशेषकर बारिश के मौसम में इसके आकर्षक प्राकृतिक दृश्य इसको एक बेहतर पिकनिक स्थल बना देते है।
सामोद - (४० किलोमीटर उत्तर - पूर्व) - सुन्दर सामोद महल का पुनर्निमाण किया गया है तथा यह राजपूत हवेली वास्तुकला का बेहतर नमूना है व पर्यटन लिए उत्तम स्थल।
विराट नगर- (शाहपुरा - अलवर मार्ग 86 किलोमीटर दूर) - खुदाई करने पर निकले एक वृत्ताकार बुद्ध मंदिर के अवशेषों से युक्त एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थान है जो राजस्थान का असाधारण व भारत का आरंभिक प्रसिद्ध मंदिर है। बैराठ में मौर्य, मुगल व राजपूत समय के स्मृतिचिन्ह भी हैं। अकबर द्वारा निर्मित एक खान (?), एक रमणीय मुगल बगीचा और जहांगीर द्वारा निर्मित चित्रित छतरियों व दीवारों से युक्त असाधारण इमारत अन्य आकर्षण हैं। 
सांभर
(पश्चिम से 14 किलोमीटर) - नमक की विशाल झील, पवित्र देवयानी कुंड, महल और पास ही स्थित नालियासार के प्रसिद्ध है।
जयसिंहपुरा खोर - (अजमेर मार्ग से 12 किलोमीटर) - मीणा कबीले के इस आवास में एक दुर्गम किला, एक जैन मंदिर और हरे भरे वृक्षों के बीच एक बावड़ी है।
माधोगढ़ - तुंगा (बस्सी लालसोट आगरा मार्ग से 40 किलोमीटर) - जयपुर व मराठा सेना के बीच हुए एतिहासिक युग का तुंगा गवाह है। सुंदर आम के बागों के बीच यह किला बसा है।
चाकसू—चाकसू से 2 किमी पूर्व में शीतला माता का मंदिर है जिसमे प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण प्रतिपदा अष्टमी को यहां मेला भरता है जिसमे लाखो की संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं।

जयपुर में आतंकवाद - १३ मई २००८ को जयपुर में श्रृंखलाबद्ध सात बम विस्फोट किए गए। विस्फोट १२ मिनट की वधि के भीतर जयपुर के विभिन्न स्थानों पर हुए‍। आठवाँ बम निष्क्रिय पाया गया। घटना में ८० से अधिक लोगों कि मृत्यु व डेढ़ सौ से अधिक घायल हुए। जयपुर (सुइसी / डीएपीपीएएआर /) [2] [3] [4] उत्तरी भारत में राजस्थान और राजस्थान का सबसे बड़ा शहर है। यह 18 नवंबर 1726 को महाराजा जय सिंह द्वितीय, आमेर के शासक द्वारा स्थापित किया गया था जिसके बाद शहर का नाम लिया गया था। [5] 2011 तक, शहर की आबादी 3.1 मिलियन है, जिससे देश में यह दसवां सबसे अधिक आबादी वाला शहर बन गया है। जयपुर को भी भारत के गुलाबी शहर के रूप में जाना जाता है। [6] जयपुर भारतीय राजधानी नई दिल्ली से 260 किलोमीटर (162 मील) स्थित है। जयपुर आगरा (240 किमी, 14 9 मील) के साथ पश्चिमी स्वर्ण त्रिभुज पर्यटन सर्किट का एक हिस्सा है। [7] जयपुर भारत में लोकप्रिय पर्यटन स्थल है और राजस्थान के अन्य पर्यटन स्थलों जैसे जोधपुर (348 किमी, 216 मील), जैसलमेर (571 किमी, 355 मील) उदयपुर (421 किमी, 262 मील) के लिए प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है। और माउंट आबू (520 किमी, 323 मील)
विषय वस्तु [छिपाएं] 1 इतिहास 2 जलवायु 3 वास्तुकला 4 जनसांख्यिकी 5 प्रशासन और राजनीति 6 अर्थव्यवस्था 7 मीडिया 8 संस्कृति 8.1 भोजन 8.2 बोली 9 रुचि के स्थान 10 खेल 11 शिक्षा 12 परिवहन 12.1 रोड 12.2 रेल 12.3 एयर 13 संचार 14 आगे पढ़ने 15 भी देखें 16 सन्दर्भ 17 बाहरी लिंक इतिहास [संपादित करें] मुख्य लेख: जयपुर का इतिहास
जय सिंह द्वितीय, जयपुर के संस्थापक जयसिंह शहर की स्थापना जयसिंह द्वितीय, आमेर के राजा ने की थी, जो 1688 से 1758 तक शासन कर रही थी। उन्होंने अपनी राजधानी जयपुर से 11 किलोमीटर (7 मील), आमेर से बढ़ती जनसंख्या को समायोजित करने और उनकी कमी को कम करने की योजना बनाई। पानी। [5] जय सिंह ने जयपुर के लेआउट की योजना बनाते समय आर्किटेक्चर और आर्किटेक्ट्स पर कई किताबों से परामर्श किया। विद्याधर भट्टाचार्य के स्थापत्य मार्गदर्शन के तहत, जयपुर वास्तुशास्त्र और शिल्पा शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर योजना बनाई गई थी। [8] शहर का निर्माण 1726 में शुरू हुआ और प्रमुख सड़कों, कार्यालयों और महलों को पूरा करने में चार साल लगे। शहर को 9 ब्लॉकों में विभाजित किया गया था, जिनमें से दो में राज्य की इमारतों और महलों में निहित है, शेष सात लोगों को जनता के लिए आवंटित किया गया था। विशाल गगनचुंबी इमारतों का निर्माण, सात गढ़वाले गेटों से छेड़ा गया। [5]
जयपुर भारत के सबसे अधिक सामाजिक समृद्ध विरासत शहरी इलाकों में एक असाधारण है। वर्ष 1727 में स्थापित, शहर का नाम महाराजा जय सिंह द्वितीय है, जो इस शहर के प्राथमिक आयोजक थे। वह एक कच्छवाहा राजपूत था और 16 99 और 1744 के आसपास के क्षेत्र में इस क्षेत्र पर शासन किया था।
सवाई राम सिंह के शासन के दौरान, शहर को 1876 में राजकुमार ऑफ वेल्स, बाद में एडवर्ड VII, का स्वागत करने के लिए गुलाबी चित्रित किया गया था। [9] कई रास्ते गुलाबी रंग में पेंट किए गए, जयपुर को एक विशिष्ट रूप दिया गया और गुलाबी शहर का नाम दिया गया। [10] 1 9वीं सदी में, शहर तेजी से बढ़ गया और 1 9 00 तक इसकी आबादी 160,000 थी। विस्तृत बुलेवार्ड्स को पक्का किया गया था और इसके मुख्य उद्योग धातुओं और संगमरमर का काम थे, 1868 में स्थापित कला विद्यालय द्वारा विकसित किया गया था। इस शहर में तीन कॉलेज थे, जिनमें संस्कृत कॉलेज (1865) और लड़कियों के स्कूल (1867) के दौरान खोला गया था महाराजा राम सिंह II का शासनकाल। 

जलवायु

जयपुर में गर्म रेगिस्तान की जलवायु और एक गर्म अर्ध शुष्क जलवायु के बीच की सीमा पर स्थित है कोपेन जलवायु वर्गीकरण "बीडब्ल्यूएच / बीएएस" [13] में सालाना 650 मिलीमीटर (26 इंच) से अधिक बारिश होती है, लेकिन मानसून के महीनों में ज्यादातर बारिश होती है जून और सितंबर के बीच गर्मियों के दौरान अप्रैल से लेकर शुरुआती जुलाई तक तापमान लगभग 30 डिग्री सेल्सियस (86 डिग्री फारेनहाइट) का औसत दैनिक तापमान रहता है। मानसून के दौरान बार-बार, भारी बारिश और झंझट पड़ते हैं, लेकिन बाढ़ आम नहीं है नवंबर से फरवरी के सर्दियों के महीनों हल्के और सुखद होते हैं, औसत तापमान 10-15 डिग्री सेल्सियस (50-59 डिग्री फारेनहाइट) से लेकर थोड़ा और नमी और ठंडे लहरों से ठंड के पास तापमान बढ़ जाता है। [14]
[छुपाएँ]Jaipur (जयपुर अन्तर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र) के जलवायु आँकड़ें
माहजनवरीफरवरीमार्चअप्रैलमईजूनजुलाईअगस्तसितम्बरअक्टूबरनवम्बरदिसम्बरवर्ष
उच्चतम अंकित तापमान °C (°F)31.7
(89.1)
36.7
(98.1)
42.8
(109)
44.9
(112.8)
48.5
(119.3)
47.2
(117)
46.7
(116.1)
41.7
(107.1)
41.7
(107.1)
40.0
(104)
36.1
(97)
31.3
(88.3)
48.5
(119.3)
औसत उच्च तापमान °C (°F)22.4
(72.3)
25.0
(77)
31.0
(87.8)
37.1
(98.8)
40.3
(104.5)
39.3
(102.7)
34.1
(93.4)
32.4
(90.3)
33.8
(92.8)
33.6
(92.5)
29.2
(84.6)
24.4
(75.9)
31.9
(89.4)
औसत निम्न तापमान °C (°F)8.4
(47.1)
10.8
(51.4)
16.0
(60.8)
21.8
(71.2)
25.9
(78.6)
27.4
(81.3)
25.8
(78.4)
24.7
(76.5)
23.2
(73.8)
19.4
(66.9)
13.8
(56.8)
9.2
(48.6)
18.8
(65.8)
निम्नतम अंकित तापमान °C (°F)−2.2
(28)
−2.2
(28)
3.3
(37.9)
9.4
(48.9)
15.6
(60.1)
19.1
(66.4)
20.6
(69.1)
18.9
(66)
15.0
(59)
11.1
(52)
3.3
(37.9)
0.0
(32)
−2.2
(28)
औसत वर्षा मिमी (inches)7.0
(0.276)
10.6
(0.417)
3.1
(0.122)
4.9
(0.193)
17.9
(0.705)
63.4
(2.496)
223.3
(8.791)
205.9
(8.106)
66.3
(2.61)
25.0
(0.984)
3.9
(0.154)
4.2
(0.165)
635.4
(25.016)
औसत वर्षाकाल0.61.00.40.71.43.911.210.03.81.30.40.435.2
स्रोत: India Meteorological Department (record high and low up to 2010)[8][9]

वास्तुकला

नहरगढ़ किले से देखा जाने वाला आइम किला 1727 में विद्याधर भट्टाचार्य ने भारतीय वास्तु शास्त्र के अनुसार शहर की योजना बनाई थी।  पूर्व, पश्चिम, ए का सामना कर रहे तीन गेट हैं

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